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तेजोमण्डिता उज्ज्वला भवाम्यहं शक्ति: शिवालिका ||

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जब हम देवी पार्वती का नाम लेते है, तो वो देवी जो भगवान शिव की अर्धांगिनी है, उनका चित्रण मन में आता है । लेकिन जब हम शक्ति स्वरूपिणी माँ दुर्गा का नाम लेते है, तो माता का एक अलग स्वतन्त्र रूप , माता की एक अलग पहचान हमें दृष्टिगोचर होती है। वो देवी जिनका शिव की ही तरह ना आदि है ना अंत वो है माँ दुर्गा। सांख्य दर्शन अनुसार शिव अगर पुरुष है तो माँ दुर्गा प्रकृति दोनों का एक अलग अस्तित्व लेकिन दोनों एक दूसरें के बिना अधूरे। शक्ति और शिव में समानता का भाव है दोनों में कोई ज़्यादा महत्व का हो या कोई कम महत्व का हो ऐसा बिल्कुल नहीं है । जब भी कोई विकट सामाजिक परिस्थिति होती तो शिव हो या माँ शक्ति अकेले ही उनसे निपटने के लिए सक्षम होते। ना हलाहल विष पीने के लिए शिव को माँ पार्वती की ज़रूरता पड़ी, और ना ही महिषासुर वध के लिए माता को शिव की । लेकिन अपने व्यक्तिगत जीवन में तो शिव और शक्ति दोनों को एक दूसरे की इतनी जरूरत होती है, कि माता ने जहाँ शिव को पाने के लिए हज़ारों वर्षों की कठिन तपस्या की, तो वहाँ शिव भी उनके वियोग में तीसरा नेत्र खोल सृष्टि संहारक तांडव करने लग गए।  ये शिव-शक्ति युगल,...

इतिहास - भूतकाल में घटित सच्चाई या फिर मनगढ़ंत कहानियाँ

बचपन में इतिहास की किताबें कहानी की तरह पढ़ डालता था । फिर समझ आया कि ये घटनाएं सच्ची है। लेकिन अब बड़ा होने पर उसमें इतने फेरबदल देख रहा हुं कि लगता है उन सब किताबों को कहानी समझना ही ज़्यादा सही था। असली इतिहास अगर जानना है तो सारा देश घूमों और हर जगह बने ऐतिहासिक भवनों, संग्रहालयों, मंदिरों और मूर्तियों के खंडहर देखों। बहुत- सी बातें अपने आप समझ आ जायेगी। सभी को कार्तिक पूर्णिमा की ढेर सारी शुभकामनाएं।  आज गुरुनानक जयंती के कारण सरकारी अवकाश है। गुरुनानक जी के प्रति श्रद्धा-स्वरूप उनके दर्शन के बारे में जानने के लिए पढ़ना शुरू किया ही था कि उनकी जन्मतारीख देखा तो 15 अप्रैल 1469 ई. दिखी। अलग-अलग जगहों पर बहुत खोजबीन करने पर यही तारीख सही लगी। फिर देखा कि ऐसा कि ऐसा कोई तो कैलेंडर होगा जिसमें कभी कार्तिक पूर्णिमा Oct-Nov की जगह अप्रैल में आ गई हो या ऐसा कुछ तो होगा जिसके कारण तिथियों में ये फेरबदल हुआ हो.. कुछ साक्ष्य नहीं मिले। कुछ स्रोतों के अनुसार गुरुनानक जी के जन्म के 399 साल बाद 1868 ई. पहली बार गुरु नानक जयंती वैशाखी की जगह कार्तिक पूर्णिमा को मनाई गई। इसका कारण जो भी मिले ...

किसानों पर एक एहसान करना, कि उनपर कोई एहसान ना करना

पिछले कई सालों से था, ये ख़याल मेरे मन में, अब टैक्स पर बात छिड़ी ही हैं, तो चलो आज कह देते हैं। 🌾किसानों पर टैक्स लगाना चाहिए, ज़रूर लगना चाहिए।🌾 ऐसा मैं इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि हर कोई अपने आस-पास के क्षेत्र में ही देख लेना ऐसे कितने समृद्ध किसान होंगे जो साल में 2 फसल निकालने के बाद भी आय 3-5 लाख से ज़्यादा की आय निकाल पाते होंगे वो भी फसल एकदम अच्छी होने पर ही। देश में बड़े से बड़ा किसान भी आज 10 लाख के ऊपर शुद्ध आय नहीं निकाल पाता होगा। तो इस हिसाब से एक आम किसान तो कहीं से कहीं तक आयकर के दायरे में नहीं आने वाले। मैं तो चाहता हूँ कि ये टैक्स की लालची सरकारें कम से कम इसी आयकर के लालच के चलते हम किसानों की आय भी बढ़वाने वाली योजनाओं पर काम करें। … हम किसान बराबर बदनाम है कि टैक्स नहीं पटाते जबकि हमारे नामपर बहुत से ख्यातिप्राप्त और बड़े बड़े व्यवसायी लोग अपनी आय कृषि में दिखाकर टैक्स में भयंकर लाभ लेते है। स्वतंत्रता के पहले तो टैक्स किसानों पर ही लगता था.. कोई भी काल हो प्राचीन, मध्य या ये अंग्रेजों का क्रूर आधुनिक काल। तो अब ऐसा क्यों है कि किसानों को आयकर के दायरे से बाहर रख...

बड़ेपापा (मेरे प्रेरणास्रोत)

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बचपन से उनका हाथ था सर पर, जो दबाव सा डालता था, हमेशा अनुशासित रहने का, पढ़ाई करने का, गलत आदतों में न पड़ने का..आदि आदि.... कभी-कभी एक बोझ सा लगता था उनका वो हाथ। फिर धीरे-धीरे जब मैं बड़ा हुआ,थोड़ा समझदार हुआ... तो समझ आया कि जिनका वो हाथ था न , उन्होंने तो न जाने कितना बोझ उठाया हुआ है अपने कंधों पर... और जो हाथ अपने बच्चों पर दबाव देने के लिए रखा है वो दरअसल हमें मजबूत बनाने के लिए है... जिससे कि हम जिंदगी की विभिन्न चुनौतियों को पार पाने लायक बन सके। और जब हमें ये समझ आया न तो उन्हें भी समझ आ चुका था कि हमें ये समझ आ गया है.... तभी तो उन्होंने वो हाथ का दबाव कम तो कर दिया... लेकिन हाथ हटाया नहीं था। फिर एक दिन उनके इसी दबाव और आशीर्वाद के फलस्वरूप मुझे सफलता मिली और उस दिन उनके चेहरे पर जो खुशी की चमक थी वो गजब ही थी..UNEXPLAINABLE ...! इसके बाद से उन्होंने अपना हाथ सर से हटा दिया और हाथों को हाथ में लेकर इस दुनियादारी में साथ चलना सिखाने लगे। वो जो बचपन से सर पर हाथ था... मेरे कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत का... वो कारण था मेरी बेफिक्री का... ये बेफिक्री इतनी आसानी से जा तो सकती नही...

नये जमाने के भिखारी

पिछले कुछ महीनों से Youtube Facebook जैसी साइट्स पर भीख मांगने वाले विज्ञापनों की भरमार सी हो गई है... इन विज्ञापनों में किसी असहाय, लाचार लोगों को एक प्रोडक्ट की तरह पेश किया जा रहा और उनकी बेबसी दिखाकर पैसे मांगे जा रहे। हो सकता है उनका उद्देश्य शायद सही भी हो.. लेकिन जितना ये NGOs विज्ञापन आदि पर खर्च कर रहे उससे अच्छा तो हजारों लोगों की मदद हो गई होती। और ये लोग विज्ञापन दिखा भी किसे रहे... हम जैसे आम लोगों को... जिनके पास पैसे की भले ही कमी हो सकती है, लेकिन मदद मांगने और मदद चाहने वालों की कोई कमी नहीं है... हम जैसे लोगों को किसी की मदद करने और दान-दक्षिणा करने के लिए किसी NGO की जरूरत नहीं है, हम अपने आसपास ही नजर दौड़ाएं तो हजारों लोग ऐसे मिलेंगे जिन्हें सच में मानवीय मदद की जरूरत होती है। सुना है और कई बार सामने भी देखा है, भीख मांगने को एक धंधे की तरह अपनाकर लोगों ने बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स खड़ी कर रखी है। बस इसी तरह की स्कीम अब ये ऑनलाइन भी चलाने लगे है, अपने सामने भिखारियों को देखकर हम थोड़ा अंदाज तो लगा ही लेते थे कि क्या सच में इसे जरूरत है या नहीं। लेकिन ऑनलाइन में तो लाचार...

Don't Judge

"लोग ऐसे तो बड़े जज बने फिरते है...." लेकिन सच्चाई तो ये है कि हमारे देश में अभी तक ऐसा कोई सही सिस्टम ही नहीं बना है, जिससे कोई साधारण आदमी किसी न्यायालय में न्यायधीश बनने की या अपने बच्चों को न्यायाधीश बनाने की सोच सकें। देश को संभालने वाले प्रमुख अंग ब्यूरोक्रेट IAS, IPS आदि एक बहुत कठिन तपस्या (UPSC परीक्षा) के बाद सिस्टम में आते है, सांसद, विधायक, मंत्रीगण अपनी लोकप्रियता के बावजूद भी निर्वाचन की प्रक्रिया से चुन कर आते है। लेकिन न्यायाधीशगण को चुने जाने की कोई खास पारदर्शी प्रक्रिया नहीं है, इसके बावजूद भी वो लोकमत की सरकार के बनाए कानून को पलटने की ताकत रखते है। हास्यपद है, लेकिन होता यही है। इसमें बदलाव की जरूरत है, जिसके लिए एक वर्तमान सरकार ने एक ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस लाने पर विचार कर रही है। लेकिन 2 दिन पहले देश के कानून मंत्री ने संसद में बताया कि देश के विभिन्न न्यायालयों में केवल 2 उच्च न्यायालय और 30 में से 2 राज्य को छोड़कर कोई भी ऐसे किसी बदलाव का समर्थन नहीं कर रहा है। मुझे ये अटपटा नहीं लगा, क्योंकि ये किसी भी समझदार की समझ से शायद ही परे होगा कि क्यो...

पूजा वगैरह सब बेमतलब की बातें है!

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हमारे त्यौहार, परंपराएं , चलन...आदि पता नहीं कब, किसने और कैसे बनाएं होंगे... लेकिन जो बने हैं... बड़े ही बेहतरीन बने है। बहुत से लोगों को ये बेमतलब की चीज ही लगगी, जब तक वो इसको करीब से देखकर समझेंगे नहीं। ये कुछ सामाजिक शब्द है, "समरसता", "भाईचारा", "सद्भाव","उल्लास", "एकता" आदि इनके अर्थ यदि ढूंढने है तो शब्दकोश नहीं, मेरे गांवों में आना किसी उत्सव के समय... रुकना और देखना करीब से और तब भी समझ न आएं तो पूछ लेना कि क्या महत्व है इन त्योहारों का, इसमें होने वाली विभिन्न रस्मों और परम्पराओं का। मूर्ति पूजा का महत्व - मेरे गांव में साल में ३ बार मूर्ति स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है।  भादो मास कृष्ण अष्टमी को कन्हैया जी, इसमें पूरा परिवार अपनी व्यस्त जीवन से समय निकाल कर एक पूर्ण उल्लास के साथ एक होकर न सिर्फ प्रभु का जन्मोत्सव मनाते है बल्कि जीवन की सब परेशानियों को भूल खूब मज़े करते है रात में चौसर खेल कर(कोई कुछ भी कहें; चौसर परिवार को तोड़ता नहीं, जोड़ता है।) अंत में मूर्ति विसर्जन के पश्चात सभी आपस में भुजली(गेंहू का कोमल हरा तना...

चमचों से सावधान

अगर जिंदगी में थोड़े भी सफल हुए हो ना, तो बस अपने चमचों से दूर रहना; क्योंकि चमचे लोग तुम्हें महानता का एहसास जरूर करा सकते, लेकिन महान नहीं बना सकते... उसके लिए तो तुम्हारा आचरण और मेहनत ही काम आएगा। चमचे तुम्हें अहंकारी बना देते है और तुम्हारी तरक्की में सबसे बड़ी बाधा होते है। और हां तुम वो चमन चुतिये होते हो जो मन ही मन खुद की तारीफ से खुश तो होते हो लेकिन असलियत में तुम्हारे पीछे हजार आलोचना होती है तुम्हारी नासमझियों की जो तुम्हें पता तक नहीं चलती। कहते है की भारत के सिस्टम में अफसरशाही और लालफिताशाही हावी है, जो देश की तरक्की में बाधक है... हां सच कहते है,.. लेकिन इस अफसरशाही के पीछे की असली जड़ चमचागिरी हैं... और ये चमचागिरी अभी से नहीं है अंग्रेजो के समय से है... उनकी चमचागिरी करने वाले ही उत्तराधिकारी हुए और धीरे धीरे ये चमचागिरी हर सिस्टम में बैठे व्यक्ति के व्यवहार में आ गई... आज हर कोई पहले खुद अपने ऊपर वाले की चमचागिरी करता है.. और फिर ऐसी ही चमचागिरी की उम्मीद वो अपने नीचे वालों से रखता है... और निसंदेह लोग लगे भी हुए है... क्योंकि आज चमचागिरी एक प्रोटोकॉल बन गया है... औ...

जीवन है चलने का नाम

मेरी हमेशा से आदत रही है कि मैं अपने तरफ से कभी कोई ग्रुप नहीं बनाता... जो बना बनाया ग्रुप मिल गया.. बस वही है.. और उसके सारे सदस्य अपने ग्रुप में है। जैसे स्कूल में या कॉलेज में मेरी क्लास में जितने भी साथ में रहे हो वो सब मेरा ग्रुप है... वैसे ज्यादातर लोग दूसरों से, ये तेरा ग्रुप ये हमारा ग्रुप, कहकर दूरी बना लेते थे.. लेकिन शायद मैं ही ऐसा एकमात्र बंदा रहा हूं जो या तो किसी ग्रुप में नहीं था या ऐसा भी कह सकते कि हर ग्रुप का एक सदस्य मैं हमेशा रहा। लेकिन कॉलेज के बाद 2 साल तो मैं लगभग नहीं के बराबर लोगों से मिला.... मेरी बात भी दिन में 4-5 लोगों से ज्यादा किसी से नहीं होती थी...।  लेकिन अब जबसे थोड़ा रेगुलर रेलवे में काम शुरू किया है, तबसे रोज-रोज नए लोगों से मिलना, नई बातें सीखना, अपने कार्यक्षेत्र के व हर तरह के लोगों के साथ बैठना, बातें करना, काम करना, अपने अपने अनुभव बताना। अब ये दैनिक दिनचर्या में शामिल होकर एक आम बात हो गई है। अगर हम भले हैं ना, तो सामने वाले भी भले ही लगते, और इन भले लोगों से बातें करने में अपना समय कब गुजार देते हैं पता ही नही चलता.... इनमें से कई तो अच्...

अब तो झूठ मत बोलो 😴

ये हमारे विशिष्ट मध्यमवर्गीय घरवाले 😐 पता नहीं क्यूं तो ऐसा सोचते है कि हम बहुत जरूरी काम कर रहे है, हमें किसी भी काम के लिए परेशान करना ठीक नहीं, क्यों न कितनी ही परेशानी उन पर आ जाएं.. हमें परेशान नहीं करना है, न ही बताना है 🤐 और इसी कारण हम इस परेशानी में रहते है कि उन पर कोई परेशानी आ भी जायेगी तो न वो हमें बताएंगे, और न ही हम उनकी मदद कर पाएंगे, हमेशा सोचते रहते कि शायद उन्हें कोई परेशानी हो रही हो तो भी वो हमसे झूठ बोल रहे है कि सब चंगा है 🙂 अब इन्हें कौन समझाए कि हमारे लिए तो सबसे ज्यादा खास आप हो.. आपके लिए ही तो सब कर रहे हम भी.. ये काम धाम सब आपके लिए ही है.. आपके और हमारे अच्छे के लिए.. हम साथ रहें, हम खुश रहें, हम सुखी रहे बस, यही सबसे ज्यादा जरूरी है, विश्वास करें... कि अब हम भी समझदार हो गए है 🤗😊 --घर से दूर रहने वाले लोगों की व्यथा 🤓

मेरे पापा कहा करते थेे !

अक्सर लोग किसी उद्भोद्न में बड़ी ही ज्ञानवर्धक बात इस तरह कहते है कि "कि मेरे पापा कहा करते थे, मेरी मां कहती थी, मेरी दादी कहती थी आदि आदि" और इसके बाद एक मस्त सी ज्ञानवर्धक बात होती थी। और मैं सोचता यार पता नहीं क्यूं मेरे परिवार वालों ने तो कभी ऐसी ज्ञानवर्धक बात बोली ही नहीं जिससे मैं कुछ सीख सकूं, और कभी मेरे पास जो कुछ भी है उसका श्रेय उन्हें दे सकूं। लेकिन सच ये है कि हमारे परिवार ने हमें शब्दों से ज्यादा आदतों से सिखाया है, कि कैसे उन्होंने हमारे लिए कितनी सारी चीज़े की है, कैसे वे रहे है और कैसे उन्होंने हमें बड़ा किया है, दरअसल उनकी हर छोटी से बड़ी चीज़ में एक सीख होती थी।  हां हमारे पापा,दादा,मम्मी,दादी और परिवार के कोई सदस्य हम से कुछ ज्ञानवर्धक बात नहीं कहा करता था, लेकिन अपनी आदतों से ही वे बहुत कुछ सीखा दिया करते थे हमें 😊 Action speaks louder than words.

मोबाइल रेडियेशन क्या सच में खतरनाक होता है?

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टेलीकम्युनिकेशन में माइक्रोवेव का उपयोग होता है जो कि बहुत कम फ्रीक्वेंसी का रेडिएशन है। और रेडिएशन शब्द से डरो नहीं, जिस प्रकाश में हम देख पा रहे वो भी रेडिएशन ही है। जिसकी जितनी ज्यादा फ्रीक्वेंसी उसकी किसी वस्तु के आर पार जाने की उतनी ही ज्यादा काबिलियत। जैसे गामा रे.. आर पार चली जाती बड़ी दीवारों के.. X-रे हमारे शरीर के आर पार जा सकती, लेकिन हड्डियों के नहीं(मेडिकल फील्ड में कम फ्रीक्वेंसी की X-रे उपयोग होती.. थोडी ज्यादा की हो तो वो हड्डी के आर पार भी हो जाएं). अब ये जो स्पेक्ट्रम है इसमें क्रम से देखो X-रे के बाद अल्ट्रावायलेट आती है.. जो स्कीन को नुकसान पहुंचाती जिससे स्किन कैंसर जैसी बीमारी भी हो सकती। फिर अपना प्रकाश जिससे हम देख पाते। इसके बाद इंफ्रारेड जो किसी ऊष्मा(Heat) को विकिरण द्वारा ट्रांसमिट करता है.. और इसी के कारण सूरज की गर्मी हम तक आ पाती और तब जाकर माइक्रोवेव का नंबर आता जो कि कहीं से कहीं तक शरीर को भेदकर नुकसान पहुंचाने की क्षमता नहीं रखती.. इसकी वेवलेंथ ज्यादा होती तो ये छोटे से छोटे छेद में से भी निकल सकती और कितने ही टेढ़े मेढे रस्ते हो.. आसानी से टकराकर मुड...

ऐसे कैसे होगा हिंदी विकास?

अपनी हिंदी भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों के आने की परम्परा बहुत पुरानी है। ज्यादातर हिंदी भाषियों को पता ही होगा तत्सम, तद्भव देशज और विदेशज शब्दों में अंतर। यदि अंग्रेजी के शब्द भी आए तो इनसे परहेज़ नहीं होना चाहिए। अंग्रेजी ही नहीं हर भाषा के शब्द आए इसमें, भाषा का विकास इसी से होता है हमें ये मानना होगा। भाषा की शुद्धता बनाए रखने की कोशिश उसे सीमित करती है और किसी भी भाषा के विकास में बहुत ही बाधक है जिसका उदाहण हमारी संस्कृत जैसी उत्कृष्ट और परिष्कृत भाषा सामने है। दूसरी बात जो भाषा के विकास के लिए जरूरी है वो है इसका साहित्य, मैं ये नहीं कह रहा कि हिंदी साहित्य से भरपूर नहीं है। पर साहित्य के कुछ अहम हिस्से जिसमें विज्ञान और तकनीक आदि आते है बहुत कम ही परिलक्षित होते दिखते है। साहित्य का एक अहम हिस्सा होता है पत्रकारिता, पर मुझे नाम गिनाओ कि कितने ऐसे अखबार और पत्रिकाएं है जिनकी खबरों और लेखों की विश्वसनीयता पर तुम 100 फ़ीसदी विश्वास कर सकते हो। अपनी भारतीय संस्कृति और दर्शन से जुड़े तथ्य जिनको अक्सर मैं गूगल पर सर्च करता हूं तो मुझे सारे अच्छे लेख और उत्कृष्ट शोध अंग्रेजी मे...

भट्टे की जगह गट्टे की सब्जी 😂

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दुनिया में बैगन की सबसे ज्यादा खपत शायद अपने बालाघाट अर्थात विदर्भ के आसपास ही होती होगी। "बैगन" को "भट्टा" कहा जाता है हमारे क्षेत्र में। एक दिन हमने अपनी खाना बनाने वाली आंटी से भट्टे बनाने बोला। और रोज़ की तरह हम अपने काम में और आंटी खाना बनाने में व्यस्त हो गई। बहुत देर बाद आंटी किचन से निकली, और विदा ले ली, पर आज कुछ ज्यादा ही समय ले लिया था आंटी ने महज भट्टे की सब्जी बनाने में, मैंने ध्यान नहीं दिया और फिर अपने में व्यस्त हो गया। मैं तो थोड़े लेट खाना खाने वालों में से हूं तो हमसे पहले भैया ने खाना ले लिया और हमसे कहने लगे वाह आज तुने कुछ नया ट्राय करवा लिया आंटी से, और इसी के साथ रेसीपी और ये मैदे के है या बेसन के या गेंहू के आटे का पूछने लगे। मैं कंफ्यूज कि ये क्या बोल रहे, मैंने क्या कर दिया ऐसा। किचन में जाकर सब्जी देखा तो हैरान ये भट्टे कब से आलू जैसे दिखने लगे? ये क्या हो गया .... !! आंटी को तो मैंने भट्टे बनाने बोला था। ये क्या है!!! अगले दिन पता चला कि ये दरअसल गट्टे की सब्जी है, मैंने भट्टे बोला था पर आंटी गट्टे समझी। चलो इसी बहाने एक नई सब्जी...

सभी कश्मीरी नागरिकों और कश्मीर हितैषी लोगों के लिए हर आम भारतीय का पैग़ाम 👇

सबसे पहले आपको एक नए सवेरे का सलाम🙏 हमारे प्यारे कश्मीरी भाइयों और बहनों हम तो सालों से कहते आ रहे थे कि #धारा370 और #35ए पर खुल कर बहस और वार्तालाप होना चाहिए और #कश्मीर को प्यार से ही भारत का हिस्सा बनना चाहिए और यही स्टैंड देश के लगभग हर आम नागरिक का वर्षों से बना हुआ है। और इसको लेके हमनें जल्दबाजी कहीं नहीं दिखाई हमनें सालों इंतजार किया, पर आज हमें ये फ़ैसला कुछ जबरदस्ती के साथ लेना पड़ा है, लेकिन ये बात भी सच है कि हम जैसे ही 370 या 35ए का नाम भी लेते,(हटाने की तो बात अलग ही है) तो कुछ राजनीतिक नेता बिगड़ने लगते थे, और इनको जरा भी छेड़ने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देने लगते। तो फ़िर ऐसे में ऐसा कैसे संभव हो पाता कि ये लोग राज़ी खुशी मान जाते। ये लोग ही कारण बने है इस जबरदस्ती का। भई इनको अगर थोड़ी सी भी भनक लग जाती ना तो ये कश्मीर में कत्लेआम करवा देते और इससे पहले करवाएं भी है। और इतिहास गवाह है कि हमेशा ऐसे कत्लेआम और दंगो में इन्हें भड़काने वाले नेताओं का कुछ नहीं जाता, क्योंकि वो तो हाई क्लास सुरक्षा में रहते और उनके बच्चें भी विदेशों में पढ़ते। इन सब के बीच पिसते आम ...

कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए? ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए?

दुनिया में सिर्फ़ उन्हीं को सुना जा रहा है जो या तो बहुत ही ज्यादा दक्षिणपंथी होते है या वामपंथी। लोगों को लगता है कि इन दो विचारधाराओं के अलावा कोई विचारधारा ही नहीं है। इसीलिए ही तो जो सरकार विरोधी सही बात करे उसे वामपंथी और जो सरकार समर्थित सही बात करे उसे दक्षिणपंथी घोषित कर दिया जाता है, और ठीक इसका उल्टा भी, अंग्रेजी में बोले तो वाइस–वर्सा। और मैं शतप्रतिशत ये दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी को भी वाम या दक्षिण पंथी घोषित करने वाले और कहलाने वाले दोनों को इनका मतलब नहीं पता। क्योंकि अगर पता होता तो ये भी पता होता कि ये विचारधाराएं तो कब की मर चुकी है, आज बस इनके नाम और संस्थाएं बची है, जो इनसे अपने मतलब ख़ूब निकाल रही।  चलों होंगे भी अगर ये दोनों वर्ग और विचारधारा, पर अगर इन दोनों से नफ़रत है सबको तो उन लोगों की बातें कोई क्यों नहीं सुनता जो नैतिक रूप से एकदम सही बात करे और इनके बीच की बात करें; पर ऐसा कैसे हम तोतों ने तो दो ही नाम सुने है इसीलिए ऐसा तो कोई वर्ग है ही नहीं जो नैतिकता से परिपूर्ण संविधान के दायरे में सही बात करें। क्योंकि संविधान बनाने वाले तो एलियन ...

Flood Solution

Assam Flood Year over year floods in same parts of the country has became so common for now, and this will more severe in the upcoming years because of the # ClimateChange . So there is no permanent solution of Climate change & this problem appearing for now (Uncle Sam) . But we cannot seat & watch all these disasters. There is one possible solution to reduce the effects of floods is the creation of wetlands near flooding areas. Wetlands slow the flow of water, also recharge the ground water. It means two problems one solution. Wetlands will not only reduce the dangerous flow of flooding water but it’ll solve the worst problem of world # WaterCrisis . Wetlands play a role in reducing the frequency and intensity of flooding by storing water from storm surges. This also reduces erosion, a particular problem in urban and agricultural areas. Wetlands can be seen as an insurance policy that provides recreation and other benefits, while protecting those who live in lo...